उत्तराखंड—  आज के समय में जब हम स्वास्थ्य को लेकर इतने जागरूक हो गए हैं और बीमारियों से बचने के लिए योग कर रहे हैं, अच्छा खाना खा रहे हैं, समय-समय पर स्वास्थ्य की जांच करा रहे हैं, ।

उसी समय एक आंकड़ा हमारे सामने एक सत्य मगर डरावनी सच्चाई की तरह खड़ा है। सड़क हादसों में मरने वालों की संख्या बर्तमान में कई गंभीर बीमारियों से होने वाली मौतों से भी ज्यादा हो चुकी है। यह सिर्फ एक समाचार या सूचना नहीं है, यह हमारे समाज, हमारी सोच और हमारी व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल खड़ा करती हैं।

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विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और भारत के सड़क परिवहन मंत्रालय की रिपोर्ट कस आकलन करें, तो हर साल देश में लगभग 1.5 लाख से 1.7 लाख लोग सड़क हादसों में अपनी जान गंवा रहें हैं।

हर दिन करीब 450 मौतें सड़क हादसों में और हर घंटे लगभग 19 मौतें हो रहीं है।घायलों की संख्या तो इसका चार गुना है।

सोचिए, जितने लोग कैंसर, हार्ट अटैक या अन्य बड़ी बीमारियों से नहीं मरते, उससे कहीं ज्यादा एक बाइक की तेज रफ्तार, एक ट्रक ड्राइवर की नींद की झपकी, या एक कार चालक के मोबाइल पर बात करने की लत के कारण एक्सीडेंट से लोग मर रहे हैं। बीमारी तो फिर भी इलाज का मौका देती है, डॉक्टर को दिखाने का समय देती है, लेकिन सड़क हादसा एक सेकंड में सब कुछ छीन देता है।

आखिर इतने हादसे क्यों हो रहे हैं? कारणों की जड़ में जाना जरूरी है-

1. तेज रफ्तार – सबसे बड़ा हत्यारा:  लगभग 70 प्रतिशत सड़क हादसों की वजह सिर्फ तेज रफ्तार होती है। युवाओं में खासकर बाइक को हवाई जहाज की तरह उड़ाने का एक अजीब सा शौक बन गया है।

100-120 की स्पीड पर बाइक चलाकर उन्हें लगता है कि वे हीरो बन रहे हैं, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि उस बाइक के ब्रेक में इतनी ताकत नहीं कि वो  इतनी स्पीड को एकदम से रोक/कंट्रोल कर  सके।

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हाईवे पर कारों की रफ्तार भी कहर ढा रही है। समय से 10 मिनट पहले पहुंचने की होड़ में लोग अपनी जिंदगी को दांव पर लगा देते हैं।

2. नशा और मोबाइल – दोहरी मौत:-  शराब पीकर गाड़ी चलाना आज एक फैशन समझा जाता है। शादी-पार्टी से लौटते समय नशे में धुत होकर ड्राइविंग करना बहुत आम बात है। शराब इंसान की सोचने-समझने की शक्ति को खत्म कर देती है।

दूसरा बड़ा कारण मोबाइल फोन है। एक मैसेज का जवाब देने के लिए 2 सेकंड के लिए सड़क से ध्यान हटना ही दुर्घटना का कारण बनता है। 60 की स्पीड पर 2 सेकंड में गाड़ी लगभग 33 मीटर दूर चली जाती है, यानी आंख बंद करके गाड़ी चलाने के बराबर।

3. हेलमेट और सीट बेल्ट से परहेज:- आज भी भारत में 75 प्रतिशत दोपहिया वाहन चालक हेलमेट नहीं पहनते। हेलमेट को हाथ में लटका कर, या आधा सिर खुला रखना स्टाइल बन गया है। जबकि सच्चाई यह है कि हेलमेट सिर की चोट से होने वाली 70 प्रतिशत मौतों को रोक सकता है।

इसी तरह कार में पीछे बैठने वाले तो सीट बेल्ट लगाते ही नहीं। उन्हें लगता है कि सीट बेल्ट सिर्फ चालान से बचने के लिए है, जबकि यह जीवन रक्षक भी है।

4. सड़कों की बदहाली और इंजीनियरिंग की कमी:- कई बार कसूर सिर्फ ड्राइवर का नहीं होता। अचानक सामने आ जाने वाला गड्ढा, बिना साइन बोर्ड के डायवर्जन, अंधेरे में बिना रिफ्लेक्टर के खड़ा हुआ ट्रक, सड़कों पर घूमते आवारा पशु, ये सब भी सड़क दुर्घटना में मौत का कारण बनते हैं। कई सड़कों पर ब्लैक स्पॉट यानी ऐसे मोड़ या जगहें हैं जहां बार-बार हादसे होते हैं, लेकिन उन पर सुरक्षा या सुधार नहीं होता हैं।

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5. लाइसेंस सिस्टम की खामी:- आज भी हमारे देश में बिना ठीक से टेस्ट दिए लाइसेंस मिल/दे दिया जाता है। कई लोगों को तो सड़क के बुनियादी नियम – जैसे लेन ड्राइविंग, ओवरटेक करने का सही तरीका, ट्रैफिक सिग्नल का मतलब तक पता नहीं होता।

नाबालिग बच्चों के हाथ में उनके माता-पिता ही गाड़ी की चाबी दे देते हैं, जो न तो शारीरिक रूप से और न ही मानसिक रूप से गाड़ी चलाने के लिए तैयार होते हैं।

*इसका असर सिर्फ एक परिवार पर नहीं, पूरे देश पर पड़ता है-

सड़क हादसे में मरने वाला अक्सर घर का कमाने वाला युवा होता है, जिसकी उम्र 18 से 45 साल के बीच होती है। एक जवान बेटे, पति, भाई या पिता की मौत से पूरा परिवार आर्थिक और मानसिक रूप से टूट जाता है।

विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार सड़क हादसों के कारण भारत को हर साल अपनी जीडीपी का लगभग 3 से 5 प्रतिशत का नुकसान होता है। यह नुकसान अस्पताल के खर्च, पुलिस, कोर्ट-कचहरी और काम करने वाले हाथों के चले जाने के फलरूप में होता है।

बीमारी से मौत होने पर परिवार को कम से कम यह संतोष होता है कि उन्होंने इलाज कराया, या बचाने की कोशिश की। लेकिन सड़क हादसे में यह मौका भी नहीं मिलता। एक फोन आता है और पूरी जिंदगी बदल जाती है।

समाधान क्या है? हम सबको मिलकर क्या करना होगा?

सरकार और प्रशासन को क्या करना चाहिए:-
– हेलमेट और सीट बेल्ट न पहनने पर सख्त और भारी जुर्माना ही नहीं, बल्कि लाइसेंस रद्द करने जैसी कार्रवाई होनी चाहिए।
– शराब पीकर गाड़ी चलाने वालों के लिए जीरो टॉलरेंस नीति अपनानी होगी। नशे में पकड़े जाने पर सीधे जेल या भारी जुर्माना का प्रावधान होना चाहिए।
– लाइसेंस देने की प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी और गुणवत्तायुक्त बनाना होगा, जैसे विदेशों में होता है। ड्राइविंग टेस्ट सिर्फ ग्राउंड पर नहीं, बल्कि असली ट्रैफिक में भी होना चाहिए।
– हर जिले में ब्लैक स्पॉट को चिन्हित करके वहां सुरक्षा और सुधार, लाइट, साइन बोर्ड और स्पीड ब्रेकर लगाने चाहिए।

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समाज और परिवार के रूप में हमारी जिम्मेदारी:-
– हमें अपने बच्चों को 18 साल से पहले किसी भी कीमत पर गाड़ी नहीं देनी चाहिए। यह प्यार नहीं, दुश्मनी है।
– परिवार का हर सदस्य यह प्रण ले कि बिना हेलमेट और बिना सीट बेल्ट के घर से नहीं निकलेगा, चाहे 100 मीटर ही क्यों न जाना हो।
– हम खुद भी और दूसरों को भी समझाएं कि तेज रफ्तार से 10 मिनट जल्दी पहुंचने से अच्छा है, 10 मिनट देर से सुरक्षित पहुंचना।
– सड़क पर किसी घायल व्यक्ति को देखकर रुकें। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार मदद करने वाले गुड सेमेरिटन को पुलिस परेशान नहीं करेगी। आपकी मदद से किसी की जान बच सकती है।तो कोशिश जरूर करनी चाहिए।

अंत में सिर्फ एक बात कहना चाहता हूं। सड़कें हमारी सुविधा के लिए बनी हैं, मौत के लिए नहीं। बीमारियों से लड़ने के लिए हमारे पास डॉक्टर, दवा और अस्पताल हैं, लेकिन सड़क हादसों से बचने के लिए हमारे पास सिर्फ एक ही दवा है – सावधानी, सावधानी और सिर्फ सावधानी।

याद रखिए, आपके घर पर कोई आपका इंतजार कर रहा है। आपके माता-पिता, आपकी पत्नी, आपके बच्चे आपकी सलामती की प्राथना कर रहे हैं। उनके लिए, अपने लिए, गाड़ी धीरे चलाएं, सुरक्षित चलें।

क्योंकि, जिंदगी अनमोल है, इसका कोई दूसरा विकल्प नहीं मिलता। आप आने परिवार के लिए पूरी दुनियां हैं। विचार कीजिये, सड़क सुरक्षा के नियमों को अपनाइए, खुद और अपने परिवार को सुरक्षित रखिए।।

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