
हल्द्वानी— आज आषाढ़ी एकादशी हैं इस दिन महाराष्ट्र और कर्नाटक में भगवान बिट्ठल की पूजा की जाती हैं, हल्द्वानी में भी कुछ परिवार हैं जो महाराष्ट्र से आये है वो बड़े धूमधाम से बिट्ठल भगवान की पूजा करते है। वो अपनी पारंपरिक भेषभूषा में खुद और बच्चों को तैयार करते है। और सनातन के इस पर्व को बड़े धूमधाम से मनाते है आइए जानते है क्या है इस त्योहार की महिमा,,,,
विट्ठल भगवान, जिन्हें विठोबा या पांडुरंग के नाम से भी जाना जाता है, सनातन हिंदू देवता हैं और विष्णु भगवान के एक रूप माने जाते हैं, विशेष रूप से महाराष्ट्र और कर्नाटक में पूजे जाते हैं।
उनकी कहानी संत पुंडलिक से जुड़ी है, जो अपने माता-पिता के प्रति समर्पित थे। भगवान विट्ठल, अपनी पत्नी रुक्मिणी के साथ, पुंडलिक के घर प्रकट हुए, लेकिन पुंडलिक अपने माता-पिता की सेवा में इतने तल्लीन थे कि उन्होंने भगवान को ईंट पर खड़े होकर प्रतीक्षा करने के लिए कहा।

भगवान विट्ठल आज भी उसी ईंट पर पंढरपुर में खड़े हैं, जो भक्त की भक्ति और समर्पण का प्रतीक है।
विट्ठल भगवान की कहानी का संक्षिप्त विवरण,और पुंडलिक की भक्ति:-
संत पुंडलिक अपने माता-पिता के प्रति बहुत समर्पित थे और उनकी सेवा में लगे रहते थे। एक दिन, भगवान विट्ठल और रुक्मिणी, पुंडलिक की पूजा से प्रसन्न होकर उनके घर पधारे। पुंडलिक, माता-पिता की सेवा में व्यस्त होने के कारण, भगवान को ईंट पर खड़े होकर प्रतीक्षा करने के लिए कहा।
भगवान विट्ठल ने पुंडलिक की भक्ति से प्रसन्न होकर, कमर पर हाथ रखकर ईंट पर खड़े हो गए। भगवान विट्ठल आज भी पंढरपुर में उसी ईंट पर खड़े हैं, जो पुंडलिक के समर्पण और भक्ति का प्रतीक है।
विट्ठल भगवान से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें:
विट्ठल’ शब्द का अर्थ है ‘जो ईंट पर खड़ा है’ यही भगवान बिट्ठल जो ईट पर खड़े है। विट्ठल भगवान का मुख्य मंदिर पंढरपुर में स्थित है, जो महाराष्ट्र का एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है।
वारकरी संप्रदाय के लोग, जो विट्ठल भगवान के भक्त हैं, प्रतिवर्ष पंढरपुर की यात्रा करते हैं।
