नईदिल्ली— लोकतंत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं। सत्ता पक्ष का काम शासन करना है तो विपक्ष का काम सरकार को आइना दिखाना, सवाल पूछना और जनहित के मुद्दों को उठाना है।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में देश में विपक्ष की भूमिका में एक खतरनाक बदलाव देखा जा रहा है। सवाल पूछने वाला विपक्ष अब सड़क पर अराजकता फैलाने वाला विपक्ष बन गया है।
जन-आंदोलन के नाम पर बंद, जाम, घेराव और हड़ताल कर आम जनता को परेशान करना और जब कोई मुद्दा न मिले तो देश की संवैधानिक संस्थाओं की साख पर ही सवाल खड़े कर देना, यही आज के विपक्ष की नई राजनीति बन गई है।

1. आंदोलन या अराजकता?
लोकतंत्र में आंदोलन का एक तरीका होता है। अपनी बात रखना, ज्ञापन देना, शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना। लेकिन आजकल आंदोलन का मतलब बन गया है – सड़क जाम करो, सरकारी दफ्तरों में ताला लगाओ, बसें रोको और आम जनजीवन को ठप कर दो।
सोचिए, जब विपक्ष किसी मुद्दे पर आह्वान करता है तो सबसे ज्यादा नुकसान किसका होता है? एक दिहाड़ी मजदूर का, जो सुबह काम पर नहीं पहुँच पाता तो उसकी दिहाड़ी कट जाती है। एक स्कूली बच्चे का, जो जाम में दो घंटे फंसा रहता है। एक मरीज का, जो एंबुलेंस में ही तड़पता रह जाता है क्योंकि सड़क बंद है। एक छोटे दुकानदार का, जिसकी दुकान बंद करवा दी जाती है।
विपक्ष कहता है कि वह जनता के लिए लड़ रहा है, लेकिन उसकी इस लड़ाई में सबसे ज्यादा पिसती आम जनता ही है।
सरकार हर मंच पर वार्ता के लिए तैयार रहती है। कर्मचारी संगठनों के साथ बैठक होती है, लिखित आश्वासन दिया जाता है, कमेटी बनाई जाती है, फिर भी विपक्ष से जुड़े संगठन कहते हैं – नहीं, हमें तो आंदोलन ही करना है। क्योंकि आंदोलन खत्म हो गया तो उनकी दुकान बंद हो जाएगी।
समस्या का समाधान उनका लक्ष्य है ही नहीं, लक्ष्य है समस्या को जिंदा रखकर राजनीति चमकाना।
कभी बेरोजगारी के नाम पर, कभी महंगाई के नाम पर, कभी किसी परीक्षा के नाम पर,वोट चोरी के नाम पर, पेपर लीक के नाम पर, युवाओं को भड़काकर सड़कों पर उतार दिया जाता है।
सोशल मीडिया पर झूठी खबरें फैलाई जाती हैं, भ्रामक वीडियो चलाए जाते हैं और फिर उसी को आधार बनाकर बंद का आह्वान कर दिया जाता है। यह जन-आंदोलन नहीं, बल्कि सुनियोजित अराजकता है।
2. संस्थाओं पर सुनियोजित हमला
जब सड़क पर अराजकता फैलाने से भी बात नहीं बनती, तो विपक्ष का दूसरा सबसे बड़ा हथियार है – देश की संवैधानिक संस्थाओं की साख पर हमला करो।
पिछले दो सालों में आप देख लीजिए, ऐसा कोई भी संवैधानिक संस्था नहीं बची जिस पर विपक्ष ने आरोप न लगाए हों।
चुनाव आयोग पर वोट चोरी का आरोप:-
सबसे ताजा और सबसे बड़ा हमला भारत के चुनाव आयोग पर है। विपक्ष ने एक नया नैरेटिव गढ़ा है – “वोट चोरी”। कहा जा रहा है कि वोटर लिस्ट में फर्जी नाम जोड़े जा रहे हैं, EVM हैक हो रही है, और चुनाव आयोग सत्ताधारी दल के इशारे पर काम कर रहा है।
लेकिन हकीकत क्या है?
भारत में वोटर लिस्ट बनाने की प्रक्रिया दुनिया की सबसे पारदर्शी प्रक्रिया है। हर बूथ पर सभी दलों के Booth Level Agent होते हैं। कोई भी नाम जोड़ने से पहले BLO घर-घर जाकर जांच करता है, फिर राजनीतिक दलों से आपत्तियां मांगी जाती हैं।
EVM एक स्टैंड-अलोन मशीन है, जिसमें इंटरनेट नहीं, ब्लूटूथ नहीं। सुप्रीम कोर्ट कई बार कह चुका है कि EVM पूरी तरह सुरक्षित है।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने तो खुला चैलेंज दिया था कि विपक्ष आए और चुनाव आयोग में पूरी प्रक्रिया को देखे, समझे।
लेकिन विपक्ष को समझना नहीं है, उसे तो आरोप लगाना है। क्योंकि अगर चुनाव आयोग पर से जनता का भरोसा उठ गया, तो चुनाव की हार को जायज ठहराना आसान हो जाएगा। यह सीधे-सीधे लोकतंत्र की जड़ पर हमला है।
न्यायपालिका और जांच एजेंसियों पर सवाल:-
जब कोर्ट से फैसला पक्ष में आता है तो विपक्ष कहता है – न्याय की जीत हुई। और जब फैसला खिलाफ आता है तो कहते हैं – न्यायपालिका दबाव में है।
ED, CBI, IT जैसी जांच एजेंसियों पर भी यही रवैया है। भ्रष्टाचार के किसी मामले में जब किसी विपक्षी नेता पर कार्रवाई होती है तो तुरंत कहा जाता है कि यह राजनीतिक प्रतिशोध है। लेकिन वही एजेंसी जब सत्ता पक्ष से जुड़े किसी मामले में कार्रवाई करती है तो उस पर चुप्पी साध ली जाती है।
उद्देश्य साफ है –
हर उस संस्था को बदनाम करो जो विपक्ष के मन मुताबिक काम न करे।
3. इस राजनीति के पीछे की मंशा क्या है?-
सवाल उठता है कि आखिर विपक्ष ऐसा क्यों कर रहा है? इसके दो बड़े कारण हैं।
पहला कारण है – मुद्दों की कमी। केंद्र सरकार और कई राज्य सरकारें लगातार विकास के काम कर रही हैं – सड़क, बिजली, पानी, गरीब कल्याण योजनाएं, डिजिटल इंडिया।
ऐसे में विपक्ष के पास ठोस जनहित का मुद्दा नहीं है, इसलिए वह आंदोलनजीवी बनकर सुर्खियों में बने रहने की कोशिश कर रहा है।
दूसरा और बड़ा कारण है – जनता के बीच अपनी प्रासंगिकता बनाए रखना। विपक्ष जानता है कि वह सदन में बहस करके, तथ्यों के साथ सरकार को नहीं घेर पा रहा है। इसलिए वह सड़क पर अराजकता फैलाकर यह दिखाना चाहता है कि देखिए, पूरा देश गुस्से में है।
लेकिन यह रणनीति उल्टी पड़ रही है। आम जनता अब समझदार हो गई है। वह सब देख रही है। जनता जानती है कि कौन काम कर रहा है और कौन सिर्फ काम रोक रहा है।
4. आम जनता क्या चाहती है?
आम हिंदुस्तानी को न तो रोज-रोज के बंद चाहिए, न ही जाम चाहिए। उसे चाहिए स्थिरता, विकास और सम्मान। उसे चाहिए कि उसका बच्चा बिना किसी अड़चन के स्कूल जाए, वह खुद समय पर दफ्तर पहुंचे, व्यापारी की दुकान चलती रहे और किसान का माल बाजार तक पहुंचे।
आंदोलन के नाम पर रोज-रोज की अराजकता से देश का विकास रुकता है। विदेशी निवेशक सोचता है कि जिस देश में हर दूसरे दिन हड़ताल होती है, वहां निवेश कैसे करें? इससे देश की छवि भी धूमिल होती है और अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुचता है।
लोकतंत्र में विरोध का अधिकार सबको है, लेकिन उस विरोध की भी एक लक्ष्मण रेखा है। आपका विरोध किसी दूसरे की स्वतंत्रता को बंधक नहीं बना सकता।
निष्कर्ष:-
विपक्ष को अपनी भूमिका पर फिर से विचार करना होगा। सड़क पर अराजकता फैलाना, आम जनता को परेशान करना और भारत के चुनाव आयोग, न्यायपालिका और जांच एजेंसियों जैसी गौरवशाली संवैधानिक संस्थाओं पर बिना सबूत के वोट चोरी जैसे बेबुनियाद आरोप लगाना, लोकतंत्र को मजबूत नहीं, बल्कि कमजोर करता है।
सरकार से सवाल पूछिए, तथ्यों के साथ घेरिए, सदन में बहस करिए, जनता के बीच जाइए – यह आपका अधिकार है और आपका कर्तव्य भी।
लेकिन आंदोलन के नाम पर अराजकता फैलाना बंद कीजिए। क्योंकि इस अराजकता में सबसे ज्यादा अगर कोई पिस रहा है, तो वह है इस देश की आम जनता।
