Spread the love

बांग्लादेश—  दछिड़ एशिया के 17 करोड़ से अधिक आबादी वाले मुस्लिम-बहुल देश बांग्लादेश में 15 सितंबर 2026 को फिर एक बड़ा फैसला आया। अवामी लीग के सात नेताओं को जुलाई-अगस्त 2024 के जन-आंदोलन के दौरान मानवता के खिलाफ अपराध के लिए मौत की सज़ा सुनाई गई।

इससे पहले नवंबर 2025 में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना और उनके गृह मंत्री असदुज्ज़मान खान कमाल को भी इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (ICT) ने इसी तरह दोषी ठहराया था। ICT में सभी जज बांग्लादेशी हैं और इसका अधिकार क्षेत्र सिर्फ बांग्लादेश तक सीमित है।

संयुक्त राष्ट्र समर्थित पैनल के अनुसार 2024 के आंदोलन में 1,400 से अधिक लोग मारे गए और 25,000 घायल हुए थे।

*जिन्हें सज़ा सुनाई गई -*

ICT के 3 सदस्यीय पैनल ने इन नेताओं को दोषी ठहराया:
1. ओबैदुल कादर – अवामी लीग महासचिव
2. बहाउद्दीन नसीम
3. मोहम्मद अली अराफात
4. शेख फ़ज़ले शम्स पराश
5. मैनुल हुसैन खान निखिल
6. सद्दाम हुसैन – छात्र लीग नेता
7. शेख वली आसिफ़ एनन – छात्र लीग नेता

पैनल ने कादर, नसीम, अराफात, पराश और निखिल की 50% निजी संपत्ति जब्त करने का भी आदेश दिया। जब्त संपत्ति करीब 500 मिलियन टका आंकी गई है, जिसे पीड़ित परिवारों को मुआवजे के रूप में देने की बात कही गई है।

सभी दोषियों पर उनकी गैर-मौजूदगी में मुकदमा चला, क्योंकि वे फरार हैं। बांग्लादेश में एक बड़ा वर्ग मानता है कि वे भारत में शरण लिए हुए हैं।

*हसीना का मामला और भारत की स्थिति -*

शेख हसीना लगातार 15 साल शासन के बाद 5 अगस्त 2024 को सत्ता से हटने के बाद से भारत में अनौपचारिक रूप से रह रही हैं। नोबेल विजेता प्रो. मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार और बाद में 12 फरवरी 2026 को हुए 13वें राष्ट्रीय चुनाव के बाद प्रधानमंत्री बने BNP प्रमुख तारिक रहमान ने 2013 की प्रत्यर्पण संधि के तहत उनकी वापसी की मांग की है।

See also  MBPG छात्रसंघ चुनाव:- एबीवीपी vs एनएसयूआई vs बागी,, क्या फिर निर्दलीय तो नही,,, ?

नई दिल्ली ने कहा है कि वह संबंधित कानूनों के तहत मामले की जांच कर रही है। अपुष्ट सूत्रों के अनुसार भारत ने उनकी सुरक्षा और निष्पक्ष मुकदमे की शर्त रखी है।

हाल ही में 78 वर्षीय हसीना ने 5 अगस्त को नई दिल्ली में एक ऑडियो प्रेस ब्रीफिंग में दिसंबर तक बांग्लादेश लौटने का संकल्प लिया। ढाका ने इस पर नाराजगी जताई और कहा कि उन्हें खुद लौटने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, बल्कि प्रत्यर्पित किया जाना चाहिए। भारत ने स्पष्ट किया कि कार्यक्रम एक स्वतंत्र प्रेस क्लब द्वारा आयोजित था।

भारत 1951 के रिफ्यूजी कन्वेंशन का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है, फिर भी अपनी वैश्विक छवि को लेकर सतर्कता बरत रहा है।

 

“नव ठाकुरिया”—

(लेखक पूर्वी भारत के वरिष्ठ पत्रकार और दक्षिण-पूर्व एशियाई मामलों के जानकार हैं।)


Spread the love

You missed