नैनीताल— हल्द्वानी नगर के वार्ड 17 में आयोजित विराट हिंदू सम्मेलन में देश, समाज और संस्कृति से जुड़े विविध विषयों पर वक्ताओं ने प्रेरक, ओजस्वी एवं राष्ट्रभाव से परिपूर्ण उद्बोधन दिए। सम्मेलन का उद्देश्य हिंदू समाज में एकता, समरसता और सांस्कृतिक चेतना को सुदृढ़ करना रहा।
सम्मेलन को संबोधित करते हुए *नमन कृष्ण महाराज* ने हिंदू इतिहास की गौरवशाली परंपरा तथा हिंदुत्व की सनातन अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा कि हिंदुत्व कोई संकीर्ण विचारधारा नहीं, बल्कि समरसता, सहअस्तित्व और मानव कल्याण का जीवन दर्शन है।
उन्होंने हिंदुत्व के समक्ष उपस्थित चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सुनियोजित रूप से हिंदू समाज को जातियों में बाँटकर आपसी वैमनस्य फैलाने के प्रयास किए गए।
महाराज जी ने स्पष्ट किया कि हमारे धर्मग्रंथों में दलित जैसे किसी भेदकारी शब्द का उल्लेख नहीं है—हिंदू समाज में सभी वर्ण समान हैं और समरसता ही हमारी मूल आत्मा है। उनके उद्बोधन ने श्रोताओं में आत्मगौरव, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक चेतना का भाव जागृत किया।
*डॉ० चंद्रा जोशी* ने अपने प्रेरणादायी संबोधन में *पंच परिवर्तन* को समाज परिवर्तन का सशक्त माध्यम बताते हुए महिलाओं की भूमिका को केंद्रीय बताया।
उन्होंने कहा कि महिला शिक्षा केवल परिवार नहीं, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र की दिशा और दशा बदलने की क्षमता रखती है।
कुटुंब प्रबोधन, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण और नागरिक कर्तव्यों जैसे विषयों पर उन्होंने सरल, संवेदनशील और प्रभावी ढंग से अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि जब मातृशक्ति जागृत होती है, तब समाज स्वतः संस्कारित और सशक्त बनता है।
*डॉ० शिवेंद्र कश्यप* ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्षों की तपस्वी, त्यागमयी और राष्ट्रनिष्ठ यात्रा का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने संघ की स्थापना के ऐतिहासिक कारणों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि संघ का उद्देश्य प्रारंभ से ही राष्ट्र को संगठित, सशक्त और आत्मनिर्भर बनाना रहा है।
संघ की शाखा को उन्होंने व्यक्तित्व निर्माण की प्रयोगशाला बताते हुए कहा कि शाखा अनुशासन, सेवा, संस्कार और राष्ट्रभक्ति का जीवंत विद्यालय है।
उन्होंने रेखांकित किया कि संघ ने समाज को जोड़ने और देश को एकसूत्र में बाँधे रखने में निरंतर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
सम्मेलन में बड़ी संख्या में नागरिकों, मातृशक्ति और युवाओं की सहभागिता रही। समस्त वक्तव्यों ने उपस्थित जनसमूह को राष्ट्रप्रेम, सामाजिक दायित्व और संगठन शक्ति के भाव से ओतप्रोत कर दिया।
सम्मेलन में बड़ी संख्या में नागरिकों, मातृशक्ति और युवाओं की सहभागिता रही। वक्तव्यों ने उपस्थित जनसमूह में राष्ट्रप्रेम और सामाजिक दायित्व की भावना को और अधिक सुदृढ़ किया।
