उत्तराखंड— हल्द्वानी के रामलीला मैदान में 8 अगस्त को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की ‘विजय शंखनाद रैली’ हुई। फिर उसी मंच पर हवन-यज्ञ और ‘शुद्धिकरण’ हुआ।
बस फिर क्या था। मंच से उठता धुआं सीधे सियासत के आसमान में पहुंच गया और देखते ही देखते मुद्दा मंच का नहीं, मानसिकताओं का शुद्धिकरण बन गया।
कांग्रेस ने इसे खड़गे के दलित समाज से आने से जोड़ते हुए भाजपा और उससे जुड़े संगठनों पर जातिगत भेदभाव का आरोप लगाया। दूसरी ओर हिंदू संगठनों ने साफ किया कि हवन खड़गे की जाति के कारण नहीं, बल्कि रैली के दौरान कथित इस्लामिक नारों और सनातन धर्म के अपमान के विरोध में कराया गया। भाजपा ने भी इस आयोजन से दूरी बनाते हुए कहा कि हवन पार्टी का कार्यक्रम नहीं था।
यानी एक मंच, एक हवन और सियासत के कई संस्करण।
मंच शुद्ध हुआ या राजनीति और मैली?
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने इसे दलित समाज के अपमान से जोड़ते हुए सवाल उठाया कि क्या किसी दलित नेता के संबोधित मंच का इस तरह ‘शुद्धिकरण’ किया जाना जातिगत भेदभाव नहीं है ?
उनका सवाल सिर्फ मंच तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने भाजपा की विचारधारा पर हमला बोला, पुलिस-प्रशासन की भूमिका पर सवाल खड़े किए और यहां तक कहा कि आधुनिक लोकतांत्रिक भारत में छुआछूत और भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए।
सवाल वाजिब भी है_अगर हवन वास्तव में किसी व्यक्ति की जाति के कारण हुआ, तो यह बेहद गंभीर और शर्मनाक मामला है। लेकिन अगर हवन का कारण वही है जो हिंदू संगठन बता रहे हैं, यानी कथित धार्मिक नारों और सनातन के अपमान का विरोध, तो फिर पूरी बहस को जातिगत रंग देना भी उतना ही गंभीर राजनीतिक सरलीकरण है।
यहीं से असली सवाल पैदा होता है_सच क्या है और सियासत किस बात को सच बनाकर जनता के सामने पेश करना चाहती है ?
खड़गे से ज्यादा भारी पड़ गया ‘मंच’
विडंबना देखिए। जिस रैली का मकसद सरकार के खिलाफ कांग्रेस का राजनीतिक संदेश देना था, उसका सबसे बड़ा राजनीतिक विमर्श अब विकास, बेरोजगारी, महंगाई या जनहित के मुद्दों पर नहीं, बल्कि इस बात पर हो रहा है कि मंच का ‘शुद्धिकरण’ क्यों हुआ।
सियासत में अब शायद भाषण से ज्यादा महत्वपूर्ण मंच हो गया है और मुद्दे से ज्यादा महत्वपूर्ण उसके बाद होने वाला हवन।
एक तरफ कांग्रेस इसे दलित अस्मिता का सवाल बना रही है, दूसरी तरफ हिंदू संगठन इसे सनातन सम्मान का प्रश्न बता रहे हैं और भाजपा कह रही है,‘कार्यक्रम हमारा था ही नहीं।
अर्थात राजनीति की गाड़ी वहीं खड़ी है, लेकिन हर दल अपनी-अपनी दिशा में उसका स्टीयरिंग घुमा रहा है।
भाजपा ने दूरी बनाई
भाजपा जिलाध्यक्ष प्रताप बिष्ट ने स्पष्ट किया कि रामलीला मैदान में हुआ हवन भाजपा का कार्यक्रम नहीं था। उनका कहना है कि रामलीला मैदान का मंच धार्मिक है और हिंदू संगठनों ने धार्मिक विधि से वहां हवन किया।
सुमित ह्रदयेश के आरोपों ने विवाद में पुलिस को भी खींचा
विवाद यहीं नहीं रुका। हल्द्वानी विधायक सुमित ह्रदयेश ने रैली से जुड़ा एक कथित कूटरचित AI वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित किए जाने का आरोप लगाते हुए पुलिस कार्रवाई की मांग की। उन्होंने नैनीताल पुलिस के मुखिया पर भी गंभीर राजनीतिक आरोप लगाए।
दूसरी तरफ रैली के दौरान वाहनों की चेकिंग और कार्यकर्ताओं को रोके जाने को लेकर कांग्रेस नेताओं द्वारा एसएसपी कार्यालय पहुंचकर किए गए कथित अमर्यादित आचरण पर भी सवाल उठे।
यानी इस पूरे प्रकरण में अब मंच के बाद माइक, मोबाइल, पुलिस और राजनीतिक मर्यादा सब कटघरे में हैं।
और फिर शुरू हुआ ‘पुतला राजनीति’ का अध्याय
शुद्धिकरण हवन के विरोध में कांग्रेस के एससी प्रकोष्ठ ने बुद्ध पार्क में प्रदर्शन किया। भाजपा और सरकार के पुतले को चप्पलों से पीटा गया और फिर उसका दहन किया गया।
इस विवाद की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि दोनों पक्ष अपने-अपने नैरेटिव के साथ खड़े हैं।
कांग्रेस कहती है_यह दलित सम्मान का सवाल है।
हिंदू संगठन कहते हैं_यह सनातन सम्मान का सवाल है।
भाजपा कहती है_यह हमारा कार्यक्रम नहीं है।
पुलिस पर राजनीतिक पक्षधरता के आरोप लग रहे हैं। और जनता देख रही है कि उसके असली सवाल फिर पीछे छूट गए। शिक्षा स्वास्थ्य महंगाई और बेरोजगारी पर बात क्यों नहीं..?
