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हल्द्वानी—   उत्तराखंड की लोकसंस्कृति और पारंपरिक वाद्य परंपरा के संरक्षण के उद्देश्य से ‘अपनी धरोहर न्यास’ द्वारा ढोल-दमाऊ कार्यशाला का आयोजन आज उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के CDS जनरल बिपिन रावत बहुउद्देशीय सभागार में किया गया।

कार्यक्रम का शुभारंभ ढोल-दमाऊ की पारंपरिक थाप, दीप प्रज्वलन और शगुन आखर के साथ हुआ। अतिथियों को स्मृति चिन्ह के रूप में ढोल-दमाऊ की लघु प्रतिकृति भेंट की गई।

कार्यक्रम में कुलपति प्रो. नवीन चंद्र लोहानी, यूकॉस्ट के महानिदेशक प्रो. दुर्गेश पंत, RSS के सह प्रांत प्रचारक चंद्रशेखर जी, डॉ. सोहन लाल, मोहन लाल, सुनीता जोशी, शांति जीना सहित कई गणमान्य उपस्थित रहे।

शांति जीना ने कुमाऊंनी में उद्घाटन संबोधन दिया और कहा कि संस्कृति के संरक्षण की शुरुआत स्वयं से होती है। इसके बाद ‘अपनी धरोहर न्यास’ पर वृत्तचित्र प्रदर्शित किया गया।

डॉ. सोहन लाल और उनकी टीम ने गणेश वंदना से ढोल-दमाऊ प्रस्तुति शुरू की और विभिन्न तालों के सांकेतिक महत्व को समझाया। प्रो. दुर्गेश पंत ने इसे सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण के लिए महत्वपूर्ण बताया।

मोहन लाल की टीम की प्रस्तुति में उनके 8 वर्षीय पौत्र हितेश कुमार ने भी भाग लिया। उन्होंने शुभ अवसरों, पर्वों और जागर परंपरा में ढोल-दमाऊ के प्रयोग को दर्शाया।

RSS सह प्रांत प्रचारक चंद्रशेखर जी ने कहा कि संस्कृति की निरंतरता तभी बनी रहेगी जब परंपराएं अगली पीढ़ी तक पहुंचेंगी। सुंदर दास और टीम ने हुड़का वादन कर उसके सांस्कृतिक महत्व को बताया।

इस दौरान उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय पर आधारित वृत्तचित्र भी दिखाया गया। कुलपति प्रो. लोहानी ने कहा कि लोक संगीत परंपरा को विश्वविद्यालय के आयोजनों का हिस्सा बनाया जा रहा है और भविष्य में भी ऐसे कार्यक्रम होंगे।

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समापन पर ‘बैणी सेना’, ‘साथी’ सहित विभिन्न संगठनों को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का संचालन प्रो. राकेश चंद्र रयाल ने किया। व्यवस्था में न्यास अध्यक्ष विजय भट्ट, कृष्ण चंद्र बेलवाल और गोपाल सिंह पटवाल की भूमिका रही।


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