देहरादून– घुघुति कुमाऊँ का एक विशेष त्योहार हैं इसदिन आटा के मोड़कर घुघुति बनाये जाते हैं।
शुबह बच्चे इन्हें कौवों को बुलाकर खिलाते हैं। पर्यावरणविद् वृक्षमित्र डॉ त्रिलोक चंद्र सोनी कहते हैं हमारे यहां पौराणिक मान्यता हैं कि चंद्रवंश का कल्याण चंद राजा हुआ करता था उसका संतान न होने के वजन वह बागेश्वर बाघनाथ के मंदिर गया वहां उसे पुत्र वरदान में प्राप्त हुआ।
उसका नाम निर्भयचंद रखा। उसके गले मे मोती माला जिसमें घुंघरू लगे थे। उसे पहनाते थे, बच्चे को माँ घुघुति नाम से पुकारती थी, बच्चा गुस्सा होता तो माँ कहती तेरी माला कौवों को दे दूं, बच्चा डर से मान जाता था ।
आवाज सुनकर कौवे आसपास आ जाते थे। राजपाट की लालच में राजा का मंत्री व उसके साथी निर्भयचंद को मारने का षड्यंत्र रचने लगे और उसे उठाकर जंगल की ओर ले जाने लगे, बच्चा चिल्लाने लगा उसकी चिल्लाने की आवाज सुनकर कौवे वहां आ गए और कौवों ने मंत्री व उसके साथियों पर झपटना सुरु कर दिया, बच्चे को छोड़कर वे वहां से भागगये।
डॉ सोनी कहते हैं सभी कौवे पेड़पर बैठे रहे औए एक कौवा बच्चा के गले से मोती की माला लेकर राजमहल के पास काऊ काऊ करने लगा। राजा कहने लगा ये क्यों चिल्ला रहा हैं देखा वहां बच्चे की माला थी राजा व उसके सैनिक कौवे के पीछे पीछे जाते रहे, जहां बच्चा था वहां पहुंच गए, बच्चे को देख कर राजा बहुत खुश हुआ, और बच्चे को लेकर घर आया।
बच्चा देखकर माँ होश में आगई और बहुत खुश हुई। बच्चे की खुशी में विभिन्न प्रकार के पकवान बनाये गए।
रानी ने बच्चे से कहा जा अपने दोस्त कौवों को इसे खिलाओ और वह बच्चा उन पकवानों को खिलाने के लिए कौवों को बुलाने लगा तब से यह त्यौहार मनाया जाता है । जिसे घुघुति त्योहार के नाम से जाना जाते हैं।
किरन सोनी कहती हैं शुबह बच्चे उठकर काले कौवा काले, घुघुति माले खा ले, ले कौवा लगोड़ मैंखेड़ दे भैबड़ा दगोड़, कहकर कौवों को बुलाकर घुघुति को खिलाते हैं इस त्योहार को बच्चों का त्योहार भी कहते हैं। देश में इसे उत्तरायण व मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता हैं।
