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नजीबाबाद/कोटद्वार–डॉ दीपिका महेश्वरी सुमन (अहंकारा) देश की पहली महिला वैज्ञानिक हैं, जिन्होंने, बच्चों में पनपती हुई भावनात्मक शून्यता को लेकर बहुत बड़ा रिसर्च किया है।

 

 

इस रिसर्च के कई चरण हैं, जिसमें सामाजिक प्राकृतिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विस्तार से विश्लेषण किया गया है।

 

डॉ माहेश्वरी के अनुसार बच्चों में भावनात्मक शून्यता का सबसे प्रमुख कारण रतिक्रिया का नियमवत् संपादन न होना है। प्रकृतिक तौर पर रतिक्रिया स्त्री की प्रमुखता पर और स्त्री के चयन से शुरू हो, स्त्री की ही मर्जी से समाप्ति की ओर बढ़ती है, परंतु सामाजिक नियमों पर इसे, पुरुष वर्ग पर आधारित कर दिया है,

 

जिसके परिणाम स्वरुप बच्चों में, भावनात्मक शून्यता पनप रही है।डॉ माहेश्वरी के विश्लेषण बताते हैं कि प्रकृति में नर और मादा अलग-अलग झुंडों में समय व्यतीत करते हैं। जब मादा को संतान उत्पत्ति की आवश्यकता पड़ती है, तब ही नर उनके समक्ष आते हैं, क्योंकि मादा के शरीर से संतान उत्पत्ति की इच्छा होने पर गंध निकलती है, तब नर और मादा विभिन्न नियमों के अंतर्गत रतिक्रिया को संपादित करते हैं।

 

उसके पश्चात मादा प्रसव और शिशु पालन के लिए, अपने अलग झुंड में चली जाती है।

 

यहां सवाल उठता है कि मानवीय स्त्रियों में ऐसा क्यों नहीं होता?

 

यहां पर डॉ महेश्वरी कहती है की स्त्री में होने वाले परिवर्तन, स्त्री को हर बार इंडिकेट करते हैं, परंतु वह उन सिग्नल्स को पकड़ नहीं पाती, इसका कारण सिर्फ उनकी परवरिश है

 

उनकी परवरिश जिस परिधि के अंतर्गत की जाती है, उन्हें यह समझने का मौका ही नहीं मिलने की नारी का जन्म होने क्यों दिया है? क्यों उन्हें गर्भ मिला है और उनके शरीर में होते हुए बदलाव क्या कह रहे हैं? उनकी परवरिश ऐसी की जाती है, जिससे उनके शरीर के सातों चक्र बंद हो, उस परिधि पर घूमते रहे, जो समाज ने स्त्री के लिए तैयार की है।

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कुछ प्राकृतिक नियम इस प्रकार हैं यह उन मुख्य नियमों में से कुछ है जिन पर सृष्टि संचालित होती है और यह एक दूसरे के पूरक हैं यदि एक नियम का संचालन रुकता है तो दूसरा नियम अपने आप सर्वमान्य हो जाता है

प्रकृति में संतान पैदा करने के तीन प्रमुख नियम है अंड निषेचन के बाद उस नर को, मादा द्वारा मार दिया जाता है, जिसके वीर्य से निषेचन किया गया है, ताकि नर अपना अधिकार न जता सके।

 

मिक्स बीज पद्धति, इसके अंतर्गत कई नरों से, एक समय पर संबंध स्थापित कर मिक्स बीज से सन्तान उत्पन्न करना, ताकि वीर्य की महत्ता न रहे।

 

प्रतियोगिता द्वारा विजयी नर तलाशना, ताकि उत्तम संतति के लिए उत्तम बीज प्राप्त किया जा सके और बेकार बीज धारण करने वाला नर, युद्ध में हार कर मृत्यु को प्राप्त हो। तीनों ही पद्धतियों में पुरुष के वीर्य की महत्ता नहीं है या फिर नर की मृत्यु तय है।

 

पक्षियों में नर की सुंदरता के साथ-साथ, उनकी अदाओं का बहुत बड़ा महत्व है, जो नर, मादा को अपनी अदाओं से मोहित कर लेता है, वह संतति पैदा करने के योग्य होता है यह नियम हमें बताते हैं कि मादा सृष्टि में हर स्थिति, परिस्थिति में सही रहती है,

 

उसे पुरुष को पैदा करने का अधिकार है, तो मृत्यु देने का भी अधिकार है, दूसरी बात यह कि प्रकृक्ति में नरों की मृत्यु बहुत है, नरों का जन्म सिर्फ और सिर्फ, स्त्री के जीवन पर बलिदान हो जाने के लिए हुआ है।

 

 

प्रकृति के नियमों के अनुसार जानवर और पशु पक्षी, मनुष्य की भांति जबरदस्ती, अपनी काम उत्तेजना को स्त्री के अंदर प्रवाहित नहीं कर सकते।अपनी काम उत्तेजना को स्त्री के अंदर, जबरदस्ती प्रवाहित करने के लिए, मनुष्य ने अपने नियम बनाए हैं,

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जिसके दुष्परिणाम स्वरूप मनुष्य में बलात्कार और स्त्री की अवज्ञा जैसे दुर्गुणों का समावेश हो गया है, क्योंकि मनुष्य प्रकृति में प्रसारित स्त्री के प्रमुखता पर, बहते नियमों को समझ नहीं पाया।

 

प्रकृति में नर और मादा अलग-अलग झंडो में रहते हैं, ताकि वे अनचाहे यौन संबंधों से बच सके। सभी पशु पक्षी अधिकतर 3 साल के अंतर के बाद, गर्भधारण करते हैं। इस 3 साल के अंतर को परवरिश काल कहा जाता है। इसमें मादा नवजात शिशु की परवरिश में समय बिताती है और शारीरिक संबंधों को महत्व नहीं देती। यदि कोई नर उससे संबंध बनाने आता है, तो वह वहां से भाग जाती है।

 

प्रकृक्ति के नियमों को न समझने के कारण ही,मानव ने आविष्कारों को जन्म दिया ताकि उनकी जिंदगी सहूलियत से कटे। अपने स्वार्थसिद्धि के लिए, उन्होंने प्राकृतिक नियमों को न मानकर, उसके एवज में जो भी आविष्कार किए है, वह प्रकृति का दोहन करके ही किए हैं।

 

 

प्राकृतिक नियम अनुसार, मादा सिर्फ श्रेष्ठ वीर्य का चयन कर, विशिष्ट प्रजाति को जन्म देती है, चाहे योनि कोई भी हो, क्योंकि मादा ने इस धरा पर विशिष्ट प्रजातियों के निर्माण के लिए ही जन्म लिया है।

 

प्राकृतिक नियम अनुसार उन नरों के वीर्य को योनि से वर्जित रखा गया है जिनमें मादा के अनुसरण का अंश नहीं होता ऐसे वीर्य धारक कुठित मानसिकता के कहलाते हैं और कुठित मानसिकता के बीज धारकों से संसर्ग करना, प्राकृतिक नियम अनुसार वर्जित है क्योंकि कुठित मानसिकता से उत्पन्न वीर्य गर्भाशय को प्रदूषित करता है, जबकि गर्भाशय एक आईसीयू है जहां पर प्रदूषित वीर्य का जाना निषेध है जब प्रदूषित वीर्य निषेध है, तब मानव द्वारा बनाए गए, गर्भ निरोधन के सभी साधन कितने हानिकारक होंगे, योनि के लिए यह हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते।

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मनुष्य द्वारा निर्मित इन साधनों का प्रयोग करने से ही गर्भाशय में अनेक बीमारियों का समावेश होता है। सिर्फ संतान उत्पत्ति के लिए रति क्रिया स्वीकार की गई है, अन्यथा शारीरिक संबंध बनाने की मनाही है क्योंकि अधिक से अधिक शारीरिक संबंध बनाने से योनि घायल होती है, अत्यधिक घर्षण योनि को नुकसान पहुंचता है और कंडोम का प्रयोग योनि में कैंसर पैदा करता है। अधिक उत्तेजना से बनाया गया, शारीरिक संबंध गर्भाशय के मुहाने पर चोट करता है जिससे रसौली उत्पन्न होती है और वह कैंसर का रूप धारण करती है,

 

 

इसलिए दवाइयां खाकर बनाया गया शारीरिक संबंध, मृत्यु का द्योतक है परंतु मानव ने अपनी सामाजिक संरचना में स्त्री का दायरा सीमित करते हुए, उसे एक ही व्यक्ति से संभोग करने के लिए विवश करते हुए, नियम बनाए हैं।

 

 

पुरुष की काम उत्तेजना के अनुसार, जितनी बार भी चाहे स्त्री का प्रयोग, अपनी काम उत्तेजना निष्कासन के लिए कर सकता है और इसका आधार मानव ने यह कह कर दिया है कि मानव सभ्य है, जंगली जानवर असभ्य है इसलिए जानवरों जैसी शारीरिक संबंध प्रणाली मनुष्य नहीं अपना सकता।

 

उनकी यह कुंठित सोच ही, समाज को इस कगार पर ले आई है कि समाज में औरतों से बलात्कार और बदतमीजियां हो रही हैं, जबकि जानवर निर्वाध संबंधों के मध्य कुशलता से जीवन जी रहे हैं मादाओ का सम्मान करते हुए।वक्त आ गया है कि हमें पूर्वजों के बने आडंबरों से निकलकर, रतिक्रिया की प्राकृतिक परिधि को समझकर, उसकी अपनाना चाहिए, जिससे मानव में भी विशिष्ट गुण वाली संतान पैदा हो सके। डॉ दीपिका माहेश्वरी % सुमन% (अहंकारा) नजीबाबाद


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