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नईदिल्ली/हल्द्वानी—  उत्तराखंड की पहाड़ियों में हर बरसात अपने साथ सिर्फ पानी नहीं, बल्कि दर्द, तबाही और अनगिनत परिवारों की उम्मीदें भी बहाकर ले जाती है।

इन्हीं जख्मों की आवाज़ सोमवार को देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था लोकसभा में गूंजी, जब नैनीताल-ऊधमसिंह नगर से सांसद एवं पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री अजय भट्ट ने नियम 377 के तहत उत्तराखंड में लगातार बढ़ रही प्राकृतिक आपदाओं का मुद्दा पूरी गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ उठाया।

सांसद अजय भट्ट ने कहा कि उत्तराखंड का भूगोल जितना खूबसूरत है, उतना ही संवेदनशील भी है। चारों ओर ऊंचे पहाड़ों से घिरे इस राज्य में ग्लोबल वार्मिंग का असर अब साफ दिखाई देने लगा है। पहले जहां भारी बारिश और बादल फटने की घटनाएं सीमित समय तक होती थीं, वहीं अब मार्च और अप्रैल से ही मौसम का मिजाज बिगड़ने लगा है।

बरसात आते-आते ये घटनाएं विकराल रूप ले लेती हैं और पूरे प्रदेश में जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।

उन्होंने सदन को बताया कि हर वर्ष प्राकृतिक आपदाएं सड़कें, पुल, खेत-खलिहान, घर और किसानों की मेहनत से तैयार फसलें पल भर में तबाह कर देती हैं।

कई परिवार अपनों को खो देते हैं, हजारों लोग विस्थापन का दर्द झेलते हैं और विकास कार्यों की रफ्तार भी थम जाती है। इसका सबसे बड़ा बोझ आम नागरिकों और राज्य की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

अजय भट्ट ने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि उत्तराखंड जैसे आपदा-संवेदनशील राज्य के लिए विशेष राहत एवं पुनर्निर्माण पैकेज उपलब्ध कराया जाए, ताकि हर वर्ष होने वाले नुकसान की प्रभावी भरपाई हो सके।

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उन्होंने कहा कि यह पैकेज केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों के जीवन को फिर से संवारने का संबल होगा, जो हर मानसून में नई चुनौतियों का सामना करते हैं।

उन्होंने उम्मीद जताई कि केंद्र सरकार उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियों और लगातार बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं की गंभीरता को देखते हुए राज्य को विशेष सहायता प्रदान करेगी, जिससे राहत, पुनर्वास और विकास कार्यों को गति मिल सके तथा आपदा प्रभावित परिवारों को समय पर सहारा मिल पाए।


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