देहरादून/नईदिल्ली—   UGC इक्विटी रेगुलेशन 2026 के खिलाफ सड़कों पर उतरा सवर्ण समाज आज खुद को अकेला महसूस कर रहा है।

तहसीलों में ज्ञापन, सोशल मीडिया पर ट्रेंड, करणी सेना से लेकर परशुराम सेना तक एक मंच पर, लेकिन ना सत्ता में बैठी भाजपा खुलकर साथ आ रही है, ना विपक्ष सीने से लगा रहा है। सवाल है ।  22 से 26 % आबादी वाले समाज के आंदोलन से सब किनारा क्यों कर रहे हैं?

सवर्ण आंदोलन : न सत्ता साथ, न विपक्ष साथ,,,, आखिर क्यों ?

कारण नंबर 1 : वोट का गणित–

देश में सवर्ण आबादी करीब 20% -26% है, जबकि SC+ST+OBC मिलाकर 70% से ज्यादा। किसी भी पार्टी के लिए 70% को नाराज करके 25% को खुश करना घाटे का सौदा है।

भाजपा जानती है कि उसका कोर वोटर सवर्ण ही है, वो कहीं जाएगा नहीं, लेकिन अगर उसने बिल को सवर्ण दबाव में वापस लिया तो दलित-OBC कहेगा – भाजपा आरक्षण विरोधी है। और 2027 में UP चुनाव में यही नैरेटिव उसकी हार का कारण बनेगा।

विपक्ष के लिए भी यही है। कांग्रेस, सपा, राजद का पूरा सामाजिक न्याय का मॉडल ही SC-ST-OBC पर टिका है। वो कैसे एक ऐसे आंदोलन का समर्थन कर दे, जिसे मीडिया “आरक्षण विरोधी आंदोलन” बता रहा है।

कारण नंबर 2 : आंदोलन का नेतृत्व बिखरा हुआ है-

दलित आंदोलन के पास चंद्रशेखर आजाद जैसा चेहरा है, OBC के पास अखिलेश यादव, लेकिन सवर्ण आंदोलन का कोई एक चेहरा नहीं।

करणी सेना, ब्राह्मण महासभा, राजपूत सभा, कायस्थ महासभा – सब अलग-अलग बैनर। सरकारें बिखरे हुए आंदोलन से नहीं डरती। जब तक आंदोलन एक बैनर, एक नेता के नीचे नहीं आता, राजनीतिक दल उसे गंभीरता से नहीं लेते।

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कारण नंबर 3 : सुप्रीम कोर्ट का डंडा-

29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने खुद कह दिया – “ये रेगुलेशन समाज को बांट देगा” और इस पर रोक लगा दी। अब सरकार कह रही है – मामला कोर्ट में है, हम क्या बोलें? और विपक्ष कह रहा है – मामला कोर्ट में है, टिप्पणी ठीक नहीं। कोर्ट की आड़ लेकर दोनों पक्षों ने अपना पल्ला झाड़ लिया।

तो सवर्ण समाज करे क्या?-

इतिहास बताता है कि SC/ST एक्ट 2018 में संशोधन के खिलाफ भी सवर्णों ने ऐसा ही बड़ा आंदोलन किया था। तब भी कोई पार्टी खुलकर साथ नहीं आई थी। अंत में सरकार ने नोटा के डर से नहीं, बल्कि कोर्ट के रास्ते से समाधान निकाला था।

इस बार भी समाधान सड़क से नहीं, कानूनी लड़ाई से ही निकलेगा। जब तक सवर्ण समाज अपने आंदोलन को “सवर्ण बनाम दलित” से हटाकर “सबके लिए समान अधिकार और झूठी शिकायतों के खिलाफ सुरक्षा” के फ्रेम में नहीं लाता, तब तक कोई भी राजनीतिक दल खुलकर साथ नहीं आएगा।

सवर्ण आंदोलन : न सत्ता साथ, न विपक्ष साथ,,,, आखिर क्यों ?

क्योंकि सियासत में सहानुभूति से नहीं चलती, संख्या बल चलता  है।, संख्या से वोट मिलते हैं, और पार्टियां सत्ता तृक पहुँचती हैं, क्योकि यह सब सवर्ण आंदोलन में नजर नही आता, इसलिए राजनीतिक दल चुप्पी साधे हुए है। जिसका परिणाम चुनाव में नजर आएगा, ऐसा प्रतीत होता हैं।।।

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