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हल्द्वानी—   एमआईईटी कुमाऊँ, शिक्षा नगर, लामाचौड़, हल्द्वानी में भारतीय शिक्षण मंडल, उत्तराखंड प्रांत के तत्वावधान में व्यास पूजन: गुरु-शिष्य ज्ञान परंपरा” विषय पर एक दिवसीय संगोष्ठी का भव्य आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम  जिसमें शिक्षा जगत की जानी-मानी हस्तियों ने सहभागिता की।

संगोष्ठी के मुख्य वक्ता प्रो. डॉ. आशुतोष भट्ट, निदेशक, व्यावसायिक अध्ययन विभाग, उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय रहे। उन्होंने भारतीय परंपरा में गुरु-शिष्य संबंध की ऐतिहासिकता, महत्व तथा वर्तमान समय में उसकी प्रासंगिकता पर विस्तृत प्रकाश डाला।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं प्रो. (डॉ.) गीता तिवारी, संयुक्त निदेशक, कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैनीताल ने अपने संबोधन में छात्रों को गुरु-शिष्य परंपरा की आध्यात्मिक गहराई और बौद्धिक अनुशासन को समझने के लिए प्रेरित किया।

उन्होंने कहा गुरु केवल ज्ञान का स्रोत नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण के मार्गदर्शक होते हैं। आज के तकनीकी युग में भी यदि छात्र सच्चे अर्थों में ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं, तो उन्हें अपने अंदर जिज्ञासा, विनम्रता और अनुशासन की भावना विकसित करनी होगी।

उन्होंने छात्रों से आह्वान किया कि वे शिक्षा को केवल नौकरी का माध्यम न मानें, बल्कि उसे आत्मविकास और समाज सेवा का साधन बनाएं।भारतीय शिक्षा पद्धति की आत्मा गुरु-शिष्य के रिश्ते में निहित है। हमें इस परंपरा को समझकर ही भविष्य की सशक्त और नैतिक पीढ़ी तैयार करनी होगी।

मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. डॉ. अमित जोशी, विभागाध्यक्ष, प्रबंधन विभाग, कुमाऊँ विश्वविद्यालय उपस्थित रहे। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल्यों और उसकी निरंतरता की आवश्यकता पर बल देते हुए युवाओं को इस दिशा में सक्रिय भागीदारी हेतु प्रेरित किया।

इस अवसर पर एमआईईटी कुमाऊँ के कार्यकारी निदेशक डॉ. तरुण सक्सेना तथा एसीआईसी के सीईओ डॉ. कमल रावत विशेष रूप से उपस्थित रहे।

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कार्यक्रम का समन्वय एमआईईटी कुमाऊँ द्वारा किया गया, जिसमें संस्थान के विभिन्न विभागों के संकाय सदस्यों—डॉ. उषा पॉल, डॉ. शैफाली, डा लतिका, हेमा नेगी , तारा दत्त, डॉ. वात्सल्य, और अन्य शिक्षकों ने सक्रिय भागीदारी निभाई।

छात्रों की उत्साही उपस्थिति एवं सहभागिता ने कार्यक्रम को जीवंत एवं प्रेरणास्पद बना दिया। यह संगोष्ठी भारतीय शिक्षा प्रणाली की मूल आत्मा गुरु-शिष्य परंपराके महत्व को समझने और आत्मसात करने की दिशा में एक सार्थक प्रयास सिद्ध हुई।


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