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हल्द्वानी–आजकल सब कुछ ऑनलाइन होता जा रहा है, जहां इसे फायदे है वहां नुकसान भी बहुत है।

 

एक तरफ हमे ऑनलाइन से तमाम सुविधाएं जैसे सभी प्रकार की जानकारी, कोई भी समान इत्यादि आसानी से उपलब्ध हो जाता है, परन्तु इसके दुष्परिणाम भी बड़ी सांख्या में नजर आने लगे है।

 

 

ऑनलाइन फ़्रॉड  का एक खतरा तो था ही, अब ऑनलाइन गेमिंग/ जुएं ने परिवारों को आर्थिक रूप से तबाह करना शुरू कर दिया है, । जिस पर अभी तक किसी का ध्यान नही गया हैं।

 

 

जिसकी लत / आदत लगनी शुरू हो गई हैं। समाचार पत्रों में लगभग प्रत्येक दिन ऑनलाइन गेमिंग से घरों में होने वाले वित्तिय नुकसान के दुष्परिणाम के समाचार आते रहते हैं।

 

 

कम उम्र के बच्चे सबसे ज्यादा इसका शिकार हो रहे है। खासकर जिनके माता पिता ने A T M या ऑनलाइन पैसा निकालने की सुविधा जिनको प्रदान कर दी हैं।वो जाने अनजाने या व्यस्तताओं के कारण अपने बच्चों को एटीएम दे देते हैं।

 

ऑनलाइन गेमिंग/जुएं के खतरे यही से शुरू होते हैं। बच्चा अगर ऑनलाइन गेमिंग में लिप्त हैं , तो लगातार जीतने  के प्रयास में हारता चला जाता हैं और फिर जीतने की अभिशाला भी प्रबल होती जाती है, और धीरे धीरे अपने माता पिता की जमापूंजी ऑनलाइन गेम में गवां देता है।

 

 

इस प्रकार एक परिवार वितीय रूप से तबाही के कगार पर पहुँच जाता है। कभी कभी अपने इस हार को छुपाने के लिए बच्चे बड़ा अपराध करने से गुरेज नही करते, कई बार यह बच्चो को आत्महत्या तक ले जाती हैं।

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भारत मे ऑनलाइन सट्टेबाजी का बाजार पच्चीस हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का हो चुका है। ऑनलाइन गेमिंग भी लगभग इतने ही रूप में उपस्थित है।

 

ऑनलाइन गेमिंग पर लगभग हर साल पचास हजार करोड़ रुपए ख़र्च किये जाते है, यह आकंडा भारत के एजुकेशन बज़ट से भी बड़ा है।

 

ऑनलाइन गेमिंग/ सट्टा के तीन प्रकार होते है-
-पहला ऑनलाइन कसीनो- यह भी घर बैठे ताश या अन्य तरीके से खेला जाता है।

-दूसरा गेम- क्रिकेट ,फूटवॉल , हॉकी आदि खेलों पर हार जीत या खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर सट्टा लगता हैं।

-तीसरा गेम- साधारण से खेल जैसे तीन पत्ती, लूडो, शतरंज इत्यादि खेल आते हैं, इसमें दो लोग आपस मे खेलकर अपनी जीत हार पर सट्टा लगाते हैं।

 

इसके मुख्यतः बढ़ने का कारण, इसकी आसानी से उपलब्धता और भी बिना किसी की नजर में आए हुए। जिससे पहचान सार्वजनिक नही हो पाती हैं।

हमारे समाज मे जुआ खेलना/ सट्टेबाजी को अच्छा नही मानते है, इसीलिए लोग खुलेआम जुआ या सट्टेबाजी से परहेज करते है।

लेकिन जब वही मोबाइल फोन या लैपटॉप से ऑनलाइन सट्टेबाजी करता है, तो किसी को इसकी खबर नहीं लगती।

 

ऑनलाइन सट्टेबाजी करवाने में बडी कंपनियाँ बेहद संगठित तरीके से अपने माया जाल में लोगो को फंसा लेती हैं। तथा यह कंपनियाँ ऐसे प्रचारित करती हैं, जैसे कि लड़के लड़कियां भी घर के कमाऊं सदस्य हैं।

 

इसमें बहुत बड़ा योगदान विशेष व्यक्तियों से प्रचार का भी हैं। जिसमे कंपनी बड़े खिलाड़ियों औऱ बॉलीवुड के कलाकारों से प्रचारित करवाती हैं, अपने सट्टेबाजी के गेमों को।

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विडंबना यह हैं कि इस पर कोई रोक टोकं भी नही है। और ना ही लग पा रही हैं। आर्थिक जोखिम का जुमला बता कर यह कंपनियां इतिश्री कर लेती हैं।

तीसरा यह कि इनको रोकने के लिए कोई भी कारगर या ठोस व्यवस्था भी नही है।

देश मे सट्टेबाजी/ जुएँ को रोकने का कानून सन 1867 में बना था। इसके अनुसार जुएं को सरकार और प्रशासन सख्ती से रोक सकता है, और सजा भी दे सकता है।

 

परंतु यह क़ानून स्पष्ठ नही है, क्योकि यह गेम ऑफ स्किल और गेम ऑफ चांस को अलग अलग मानता है।

 

स्किल गेम शतरंज जैसे खेल हैं, जिसमे कौशल का इस्तेमाल होता हैं, इसके विपरीत जिसमे पाशे या लॉटरी का इस्तेमाल होता हैं जो पूरी तरह किस्मत पर आधारित होता हैं यह गेम ऑफ चांस हैं।

 

किस्मत और कौशल का अतंर बहुत बारीक होता हैं । इसी का फायदा उठाते हुए ऑनलाइन सट्टेबाजी/गेमिंग ने अपने पांव पसार लिए है।

 

ऐसी कंपनियां देश के बाहर भी सक्रिय है।

ऑनलाइन गेमिंग/ सट्टेबाजी की लत जिस प्रकार समाज मे फ़ैलती जा रही हैं, यह समाज और सरकार के लिए चिंता का विषय होनी चाहिये।

इस समस्या का समाधान क्या होना चाहिए-

सबसे पहले इसको नियंत्रित करने वाले क़ानूनों को बर्तमान परिस्थितियों के हिसाब से संशोधित किया जाना चाहिए, जिससे मनमानी ना होने पाएं। वर्तमान में उनपर कोई रोकटोक नहीं हैं।

बच्चों और युवकों को इस प्रकार की सट्टेबाजी से दूर रखना चाहिए। इस पर लगने वाले पैसों पर भी नियंत्रण की आवश्यकता है।

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ऑनलाईन गेमिंग मनोरंजन का साधन हो सकते है पर आमदनी का साधन नही होना चाहिए।

 

यह सभी को पता होना चाहिए कि इस ऑनलाइन सट्टेबाजी में सदा सट्टा खिलाने वाला ही जीतता हैं।

ऑनलाइन सट्टेबाजी/गेमिंग के विस्तृत फ़ैलाव को देखते हुए स्कूलों में इनके दुष्प्रभावों के लिए जागरूकता अति आवश्यक हैं।

जो लोग इसकी लत के शिकार हो गए हैं ,वहां एनजिओ या सरकारी तौर पर इससे बचने के उपाय बताना चाहिए, जो आज एक अतिआवश्यक कदम हैं।

कई बार बच्चें अभिवाहको को बड़ी वित्तीय चोट पहुँचा देते हैं और पता तब चलता है जब वित्तीय नुकसान हो चुका होता हैं।

सट्टेबाजी/ऑनलाइन गेमिंग परिवार और समाज दोनों को खोखला कर रही हैं। जिस पर रोक लगना अतिआवश्यक हैं।

कंपनियां इसका प्रचार बहुत चमकीले तरीके से करती हैं, जिसको रोकने की आवश्यकता है, देश के लोगो को आज इससे बचाने की जरूरत है,

कल कही बहुत देर ना हो जाये।।।।


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