उत्तराखंड– दिल्ली के जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर कथित लाठीचार्ज के विरोध में उत्तराखंड में छात्र शक्ति और बेरोजगार युवाओं का आक्रोश फूट पड़ा।
राजधानी देहरादून से लेकर कुमाऊं के मुख्य द्वार हल्द्वानी तक मंगलवार को विरोध प्रदर्शन हुए, जहां युवाओं, राजनीतिक संगठनों और कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने केंद्र सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग उठाई।
हल्द्वानी में कांग्रेस का जोरदार प्रदर्शन, पुतला दहन
हल्द्वानी के बुद्ध पार्क में महानगर कांग्रेस कमेटी ने भाजपा सरकार के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया और केंद्र सरकार का प्रतीकात्मक पुतला दहन किया। प्रदर्शनकारियों ने छात्र-युवाओं पर बल प्रयोग की कड़ी निंदा करते हुए इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन बताया।
महानगर कांग्रेस अध्यक्ष एडवोकेट गोविंद सिंह बिष्ट ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर लाठीचार्ज लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत है। उन्होंने आरोप लगाया कि कई छात्र अपनी मांगों को लेकर आमरण अनशन पर बैठे हैं, लेकिन केंद्र सरकार उनकी बात सुनने को तैयार नहीं है।
“देश के भविष्य माने जाने वाले युवाओं के साथ इस तरह का व्यवहार किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए उचित नहीं कहा जा सकता।”एडवोकेट गोविंद सिंह बिष्ट
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार को इस पूरे घटनाक्रम की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफा देना चाहिए।
देहरादून में सचिवालय कूच के दौरान पुलिस से झड़प
देहरादून में उत्तराखंड बेरोजगार संघ के बैनर तले सैकड़ों युवाओं और विभिन्न राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं ने सचिवालय कूच किया। प्रदर्शनकारियों ने भर्ती प्रक्रियाओं को जल्द शुरू कराने और केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला।
सचिवालय की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने भारी बैरिकेडिंग लगाकर रोकने का प्रयास किया। इस दौरान पुलिस और छात्रों के बीच तीखी बहस, धक्का-मुक्की और झड़प की स्थिति बन गई। आक्रोशित युवा बैरिकेड्स हटाकर आगे बढ़ने की कोशिश करते रहे, जिससे माहौल तनावपूर्ण हो गया।
SFI और AAP का प्रदर्शन, सोनम वांगचुक को समर्थन में,,
देहरादून में स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) और आम आदमी पार्टी (AAP) के कार्यकर्ताओं ने गांधी पार्क के सामने जोरदार प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने लद्दाख के प्रमुख पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का समर्थन करते हुए कहा “हम आतंकवादी नहीं हैं, हम इस देश के नागरिक हैं।”
छात्रों ने कहा कि वे सोनम वांगचुक की मांगों और उनके संघर्ष के साथ मजबूती से खड़े हैं।
प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगें
UKPSC JE और AE भर्ती का नया विज्ञापन तुरंत जारी किया जाए।
उत्तराखंड पुलिस भर्ती की वेटिंग लिस्ट अविलंब जारी हो।
रुकी हुई सभी लंबित भर्तियां शुरू हों और नियमित भर्ती कैलेंडर घोषित किया जाए।
भर्ती परीक्षाओं में कथित धांधली और भ्रष्टाचार की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान अपने पद से इस्तीफा दें।
“रोजगार मांगना गुनाह नहीं” बेरोजगार युवा प्रदर्शनकारी ने कहा_“मैं एक बेरोजगार युवा, छात्र और अभ्यर्थी के तौर पर यहां अपने साथियों की आवाज उठाने आया हूं। उत्तराखंड का युवा रोजगार मांग रहा है, लेकिन सरकार उसे अवसर देने के बजाय रोक रही है। हम सिर्फ अपनी मांगें रखने आए हैं, फिर हमें सचिवालय तक जाने से क्यों रोका जा रहा है ?
शांतिपूर्ण छात्रों पर लाठी, आंसू गैस : आखिर सरकार इतनी डरी क्यों है ?
दिल्ली के जंतर-मंतर पर जो कुछ हुआ, उसने लोकतंत्र की आत्मा को झकझोर कर रख दिया। शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांगों को लेकर संसद मार्च कर रहे छात्रों पर पुलिस ने जिस तरह लाठीचार्ज किया, आंसू गैस छोड़ी और उन्हें सड़कों पर घसीटा, वह किसी लोकतांत्रिक देश के लिए शर्मनाक तस्वीर है।
ये छात्र कौन थे? कोई हथियारबंद भीड़ नहीं, कोई हिंसक संगठन नहीं, बल्कि देश के वही युवा थे जो बेहतर शिक्षा, पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया और अपने भविष्य की सुरक्षा की मांग कर रहे थे। लेकिन उन्हें जवाब मिला लाठियों से, आंसू गैस से और खामोशी थोपने की कोशिश से।
सिर फटे, हाथ-पैर टूटे, लेकिन सवाल अभी भी जिंदा है
लाठीचार्ज में कई छात्र घायल हुए। किसी का सिर फट गया, किसी के हाथ-पैरों में गंभीर चोटें आईं। आंसू गैस के गोले छोड़े गए, मानो देश के भविष्य को अपराधी घोषित कर दिया गया हो। आखिर इन छात्रों का कसूर क्या था? क्या अपनी बात कहना अब अपराध है? क्या संसद तक अपनी मांग पहुंचाने की कोशिश लोकतंत्र के खिलाफ है?
सरकार से सबसे बड़ा सवाल यही है _ अगर छात्र शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे, तो उन पर इतनी कठोर कार्रवाई क्यों की गई? क्या सरकार युवाओं की आवाज सुनने से डरती है? या फिर हर असहमति को बल प्रयोग से दबाने की नीति अब सामान्य बना दी गई है?
लोकतंत्र में असहमति अपराध नहीं
लोकतंत्र की ताकत उसकी आलोचना सहने की क्षमता में होती है। लेकिन जंतर-मंतर की घटना ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सरकार अब आलोचना और विरोध को दुश्मनी मानने लगी है? जब छात्र रोजगार, शिक्षा और पारदर्शिता की मांग करते हैं, तो उन्हें संवाद नहीं, बल्कि लाठियां क्यों मिलती हैं?
यह केवल छात्रों पर हमला नहीं था, बल्कि उस अधिकार पर हमला था जो संविधान हर नागरिक को देता है _ शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात कहने का अधिकार।
जवाब देना होगा
सरकार को देश के युवाओं को यह बताना होगा कि आखिर यह कार्रवाई क्यों की गई। किसके आदेश पर लाठीचार्ज हुआ? आंसू गैस का इस्तेमाल क्यों किया गया? और घायल छात्रों की जिम्मेदारी कौन लेगा ?
यदि सरकार सच में युवाओं के भविष्य की चिंता करती है, तो उसे पहले उनकी आवाज सुननी होगी, न कि उन्हें सड़कों पर खून से लथपथ छोड़ देना होगा।
जंतर-मंतर की सड़कों पर बहा यह खून केवल कुछ छात्रों और सिपाहियों का नहीं, बल्कि उस लोकतांत्रिक विश्वास का प्रतीक है जिसे बचाए रखना हर सरकार की जिम्मेदारी है। और आज देश पूछ रहा है _ क्या सरकार जवाब देगी, या फिर युवाओं की आवाज को लाठियों के शोर में दबाने की कोशिश जारी रहेगी ?
