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हल्द्वानी—-   देश की सीमाओं की रक्षा में अपना जीवन समर्पित करने वाले ‘जंगी सिक्स’ के जांबाज योद्धा हवलदार करन सिंह का 89 वर्ष की आयु में निधन हो गया।

उनके निधन की खबर से कुमाऊं रेजिमेंट, 6 कुमाऊं के पूर्व सैनिकों और सैन्य परिवारों में शोक की लहर है। हवलदार करन सिंह ने भारतीय सेना में रहते हुए 1962, 1965 और 1971 के युद्धों में देश की सेवा की और कई कठिन सैन्य परिस्थितियों का सामना किया।

बचपन से था सेना में जाने का जुनून

हवलदार करन सिंह का जन्म 3 फरवरी 1937 को पिथौरागढ़ जिले के बाकू गांव में हुआ था। पहाड़ के युवाओं की तरह उनके भीतर भी बचपन से ही देश की सेवा और सेना में जाने का जज्बा था। इसी जुनून के साथ उन्होंने 28 सितंबर 1956 को कुमाऊं रेजिमेंट में भर्ती होकर सैन्य जीवन की शुरुआत की।

प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उनकी तैनाती 6 कुमाऊं में हुई। अपनी मेहनत, अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा के बल पर उन्होंने यूनिट में एक भरोसेमंद और जांबाज सैनिक के रूप में पहचान बनाई।

बैटल ऑफ वालोंग के वीर साक्षी

वर्ष 1962 का भारत-चीन युद्ध हवलदार करन सिंह के सैन्य जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय रहा। उन्होंने ऐतिहासिक बैटल ऑफ वालोंग में हिस्सा लिया।

विषम परिस्थितियों और दुश्मन की भारी सैन्य ताकत के सामने भी 6 कुमाऊं के जवानों ने अदम्य साहस का परिचय दिया और आखिरी समय तक मोर्चे पर डटे रहे। इसी वीरता के कारण 6 कुमाऊं को सम्मानपूर्वक ‘जंगी सिक्स’ के नाम से पहचान मिली।

हवलदार करन सिंह इस ऐतिहासिक युद्ध के प्रत्यक्ष सहभागी और साक्षी रहे। उनके जीवन की यह वीरगाथा आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा बनी रहेगी।

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1965 और 1971 की जंग में भी निभाया फर्ज

देश की सेवा का उनका सफर यहीं नहीं रुका। वर्ष 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भी उन्होंने भारतीय सेना के वीर सैनिक के रूप में अपना कर्तव्य निभाया। इसी युद्ध के बाद दुनिया के नक्शे पर एक नए देश बांग्लादेश का उदय हुआ।

करीब 16 वर्षों तक भारतीय सेना में सेवा देने के बाद हवलदार करन सिंह वर्ष 1972 में हवलदार पद से सेवानिवृत्त हुए और इसके बाद हल्द्वानी में बस गए।

पिता के नक्शेकदम पर चले दोनों बेटे

हवलदार करन सिंह ने सिर्फ खुद ही देश की सेवा नहीं की, बल्कि अपने परिवार में भी सैन्य परंपरा को आगे बढ़ाया। उनके दोनों बेटे ललित सिंह और हरीश सिंह भी भारतीय सेना में सेवाएं देकर सेवानिवृत्त हुए।

पिछले कुछ समय से हवलदार करन सिंह अस्वस्थ चल रहे थे और नोएडा में उनका उपचार चल रहा था। उपचार के दौरान उनका निधन हो गया। उनके जाने से पूर्व सैनिक समाज ने एक ऐसे योद्धा को खो दिया है, जिसने अपने जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष मातृभूमि की रक्षा के लिए समर्पित कर दिए।

चित्रशिला घाट पर दी जाएगी अंतिम विदाई

हवलदार करन सिंह का अंतिम संस्कार 9 अगस्त 2026 को सुबह 9 बजे चित्रशिला घाट, हल्द्वानी में किया जाएगा। इस दौरान कुमाऊं रेजिमेंट और 6 कुमाऊं के पूर्व सैनिकों के साथ बड़ी संख्या में पूर्व सैनिक, सैन्य परिवार और गणमान्य लोग उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंचेंगे।

पूर्व सैनिकों ने उनके निधन पर गहरा दुख जताते हुए कहा कि देश की रक्षा में अपना जीवन समर्पित करने वाले वीर सैनिक कभी नहीं मरते।उनका साहस, त्याग और राष्ट्रभक्ति हमेशा लोगों को प्रेरणा देती रहेगी।

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हवलदार करन सिंह का सैन्य जीवन साहस, अनुशासन, कर्तव्य और राष्ट्रभक्ति की ऐसी कहानी है, जिसे वक्त भी नहीं मिटा सकता। बैटल ऑफ वालोंग से लेकर 1965 और 1971 के युद्धों तक उनकी सेवा और समर्पण भारतीय सेना के गौरवशाली इतिहास का हिस्सा रहेगा।

‘जंगी सिक्स’ के वीर योद्धा करन सिंह को अंतिम सलाम… उनकी वीरता और देशभक्ति की गूंज आने वाली पीढ़ियों तक सुनाई देती रहेगी।


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